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चीन के युन्नान प्रांत में रहने वाली बुलांग जनजाति के लोग जवान होते ही अपने दांत काले कर लेते हैं। इस परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि काला रंग शक्ति और सुंदरता का प्रतीक है। बुलांग लोगों का मानना है कि दांत काले करने से व्यक्ति बुरी शक्तियों और विपत्तियों से बच जाता है।

इस जनजाति के दांत काले होने का इतिहास एक हजार साल पुराना है। (फोटो क्रेडिट-एससीएमपी)
दुनिया भर में लोग अपने दांतों को मोती जैसा सफेद और चमकदार बनाने के लिए महंगे टूथपेस्ट और डेंटिस्ट का सहारा लेते हैं। लेकिन चीन के युन्नान प्रांत की पहाड़ियों में एक ऐसी जनजाति रहती है जिनकी सोच आधुनिक दुनिया से बिल्कुल उलट है। यहां की बुलांग जनजाति के लिए सफेद दांत खूबसूरती नहीं, बल्कि जानवरों और शैतानों की पहचान हैं। इस प्राचीन परंपरा को निभाने के लिए यहां के लोग सदियों से अपने दांतों को पूरी तरह से काला करते आ रहे हैं। युन्नान के जंगलों में बसी इस जनजाति का इतिहास एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है और आज भी इनके रीति-रिवाज किसी को भी हैरान कर सकते हैं। बुलांग समुदाय में जब कोई बच्चा किशोरावस्था (14-15 वर्ष) में प्रवेश करता है तो उसके लिए एक विशेष सांस्कृतिक अनुष्ठान किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘रांची’ कहा जाता है।
यह सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक बच्चे के वयस्क होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। ‘रांची’ का असली मतलब दांतों को काला करने की पूरी प्रक्रिया है, जिसके बाद ही किसी लड़के या लड़की को समाज में पूरा अधिकार मिलता है। इस चौंकाने वाली परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि काला रंग ताकत और सुंदरता का प्रतीक है। बुलांग लोगों का मानना है कि दांत काले करने से व्यक्ति बुरी शक्तियों और विपत्तियों से बच जाता है। ‘रांची’ की इस प्रक्रिया में बहुत धैर्य और समय की आवश्यकता होती है। इसे पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले खट्टे फलों का रस दांतों पर लगाया जाता है, जिससे दांतों की ऊपरी परत रंग पकड़ने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद लकड़ी या राल जलाने से निकलने वाले गाढ़े काले धुएं का उपयोग दांतों को स्थायी रूप से रंगने के लिए किया जाता है।
कई बार युवा लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को दांत रंगने में मदद करते हैं, जिसे सामाजिक मेलजोल का हिस्सा माना जाता है। इस अनुष्ठान के बिना, बुलांग समुदाय में किसी को भी शादी करने या गांव के महत्वपूर्ण निर्णयों में भाग लेने की अनुमति नहीं है। उनके लिए ‘रांची’ एक परीक्षा है जो साबित करती है कि आप अब बच्चे नहीं हैं और जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं. इन लोगों का यह भी मानना है कि इस तरह से दांतों को काला करने से दांत मजबूत हो जाते हैं और बुढ़ापे तक नहीं गिरते। जब कोई लड़का ‘रांची’ की रस्म पूरी करने के बाद वयस्क हो जाता है, तो उसे समाज की ओर से एक लंबी कुल्हाड़ी, एक बैग और एक कंबल दिया जाता है। लड़कियों को नए कपड़े और बांस की टोकरियाँ उपहार में दी जाती हैं। आज भी युन्नान के गांवों में कई बुजुर्गों के काले दांत इस प्राचीन और लुप्त होती संस्कृति की याद दिलाते हैं।
हालाँकि, यह प्रथा चीन तक ही सीमित नहीं है; सामंती जापान और वियतनाम के कुछ हिस्सों में वफादारी और रुतबे की निशानी के तौर पर दांतों को काला करने का चलन रहा है। बुलांग जनजाति की अन्य परंपराएं भी उतनी ही खास और अलग हैं। यहां की महिलाएं अपने कानों में बड़े और भारी झुमके पहनती हैं। ऐसा माना जाता है कि कान के छेद जितने बड़े होंगे, महिला उतनी ही अमीर और उच्च सामाजिक स्थिति वाली होगी। वहीं, पुरुषों के लिए भी अपने शरीर पर टैटू बनवाना अनिवार्य माना जाता है। बिना टैटू वाले व्यक्ति को समाज में ‘कायर’ माना जाता है। लड़के अक्सर अपने शरीर पर मछली, खतरनाक जानवरों और जादुई प्रतीकों के टैटू बनवाते हैं, जो उनकी बहादुरी को दर्शाते हैं। उनकी शादी की रस्मों को भी तीन चरणों में बांटा गया है। पहली रस्म सगाई के समय होती है, जिसमें हाथ पर धागा बांधकर आशीर्वाद लिया जाता है। दूसरी रस्म के बाद जोड़ा साथ रहने लगता है और तीसरी रस्म अक्सर तब होती है जब उनके घर में पहले बच्चे की किलकारी गूंजती है।
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न्यूज18 हिंदी (नेटवर्क 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत। इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रीजनल सिनेमा के प्रभारी। डेढ़ दशक से अधिक समय से मीडिया में सक्रिय। नेटवर्क 18, टाइम्स ग्रुप के अलावा…और पढ़ें











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