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एक कार दुर्घटना ने 33 वर्षीय निकोलस एथरटन की जिंदगी बदल दी। दिमाग में चोट लगने के कारण वह अब बिना सोचे-समझे किसी से भी सच बोल देते हैं, जिसके कारण उन्हें एक के बाद एक कई नौकरियां गंवानी पड़ीं। इस दुर्लभ स्थिति के कारण कोई भी उसे नौकरी नहीं देना चाहता।

जिंदगी की राह में एक छोटा सा हादसा कब इंसान की पूरी पर्सनैलिटी बदल दे, कोई नहीं जानता। कभी-कभी शारीरिक घाव तो ठीक हो जाते हैं, लेकिन मस्तिष्क के अंदर लगी चोट व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और बोलने के तरीके को पूरी तरह से बदल देती है, जिसके कारण समाज उसे गलत समझने लगता है। अक्सर ऐसी घटनाओं के बारे में पढ़ने और सुनने को मिलता रहता है। ऐसा ही कुछ हो रहा है इंग्लैंड के ग्लूसेस्टर निवासी 33 वर्षीय निकोलस एथरटन के साथ। एक दुर्घटना में उनके मस्तिष्क पर गंभीर चोट लगी। वह बच तो गए, लेकिन दिमाग की इस चोट के बाद उन्हें सच बोलने में ऐसी दिक्कत हुई कि उन्हें एक के बाद एक कई नौकरियों से बाहर कर दिया गया। इतना ही नहीं, उनके इस दुर्लभ गुण यानी ‘नो फिल्टर’ व्यवहार के कारण अब कोई भी उन्हें नई नौकरी पर नहीं रखना चाहता।
आपको बता दें कि पिछले कुछ साल निकोलस एथरटन के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं। एक भयानक कार दुर्घटना के बाद उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट लगी। इस चोट का सबसे अजीब और चुनौतीपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि निकोलस ने अपना ‘अवरोध’ यानी खुद को नियंत्रित करने की क्षमता खो दी। मेडिकल साइंस में इसे ‘लैक ऑफ इनहिबिशन’ कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति बिना सोचे-समझे जो भी मन में आए बोल देता है। वह यह तय नहीं कर पाता कि उसकी बातें सामने वाले को कैसी लगेंगी. इसी समस्या के कारण हाल ही में उन्हें एक रेस्टोरेंट में अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। घटना के बारे में बताते हुए निकोलस ने कहा कि वह अपने काम में बहुत अच्छे थे और उन्हें फ्रंट डेस्क पर मेहमानों का स्वागत करना पसंद था। लेकिन एक दिन उसके मन में कुछ बातें आईं और वह बिना सोचे-समझे कुछ बोल गया।

निकोलस ने आगे कहा कि जब एक महिला कर्मचारी ने उनकी मदद की तो उन्होंने अनजाने में उसे ‘अच्छी लड़की’ कह दिया, जिससे उन्हें ठेस पहुंची. इसी तरह, जब उन्होंने अपने दो चचेरे भाइयों को एक साथ देखा, तो उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वे ‘कडल दोस्त’ हैं। ऐसे में उनके सहकर्मियों ने इसे अशोभनीय और अपमानजनक माना और उनके खिलाफ शिकायत की, जिसके बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। निकोलस का कहना है कि ये उनके साथ सरासर अन्याय है. वे इंटरव्यू के दौरान ही नियोक्ता को अपनी स्थिति के बारे में बता देते हैं, लेकिन कंपनियां अपने बाकी स्टाफ को इसके बारे में शिक्षित नहीं कर पाती हैं। उन्होंने बताया कि कई बार वह सीनियर्स के सामने आंखें घुमा लेते हैं, जो अनुशासनहीनता मानी जाती है. लेकिन निकोलस के मुताबिक, सूचनाओं को प्रोसेस करने का यह उनका अपना तरीका है ताकि उनका ध्यान दूसरी चीजों से न भटके।
आपको बता दें कि 2015 से 2017 तक ब्रिस्टल के पुनर्वास केंद्र में इलाज कराने के बाद निकोलस ने फिर से चलना सीखा और अपने काम पर लौट आए। उनकी मां एन एथरटन का कहना है कि निकोलस को उनकी पिछली नौकरी में ‘जादूगर’ कहा जाता था क्योंकि वह मेहमानों का स्वागत करने में माहिर थे। मां ने दुख जताते हुए कहा कि कंपनियों को अपने कर्मचारियों को शिक्षित करना चाहिए, ताकि वे समझ सकें कि निकोलस का इरादा किसी को ठेस पहुंचाने का नहीं था. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि क्रॉनिक ट्रॉमैटिक एन्सेफैलोपैथी (सीटीई) और मस्तिष्क की चोट लोगों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है। इसमें मूड में बदलाव, व्यक्तित्व में बदलाव, कमजोर याददाश्त और बोलने में हकलाना जैसे लक्षण शामिल हैं। चैरिटी संस्था ‘हेडवे ग्लॉस्टरशायर’ की सीईओ जूली रीडर-सुलिवन के मुताबिक, निष्पक्ष माहौल बनाना नियोक्ताओं की जिम्मेदारी है। यह सिर्फ किसी के गलत काम को माफ करने के बारे में नहीं है, बल्कि कर्मचारियों को यह समझाने के बारे में भी है कि ऐसी स्थिति में उन्हें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
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न्यूज18 हिंदी (नेटवर्क 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत। इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रीजनल सिनेमा के प्रभारी। डेढ़ दशक से अधिक समय से मीडिया में सक्रिय। नेटवर्क 18, टाइम्स ग्रुप के अलावा…और पढ़ें











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